
बाढ़ और बिहार: इतिहास की धरती पर वर्तमान का दर्द
पंजाब, जम्मू और उत्तराखंड की बाढ़ ने पूरे देश का ध्यान खींचा। हर न्यूज़ चैनल, हर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म इन्हीं तस्वीरों और रिपोर्टों से भरा हुआ था। लेकिन उसी समय बिहार भी बाढ़ की चपेट में था। गाँव-गाँव पानी में डूबा, घर बह गए, ज़िंदगियाँ उजड़ गईं -पर राष्ट्रीय मीडिया और बड़े कॉर्पोरेट घरानों की नज़र वहाँ नहीं गई।
क्या बिहार के लोग भारतीय नहीं हैं? क्या उनकी पीड़ा समाचार योग्य नहीं है?
देश की सबसे बड़ी कंपनियों के पास अरबों का CSR फंड है। उद्योगपतियों के नाम पर गगनचुंबी इमारतें और चमचमाते ब्रांड खड़े होते हैं। पर जब बिहार डूबता है तो न अंबानी-अदानी दिखते हैं, न ही वेदांता समूह के अनिल अग्रवाल – जिनकी जड़ें इसी मिट्टी से हैं। यहाँ तक कि बिहार की सबसे बड़ी मैनपावर कंपनी SIS भी इस संकट में कहीं नज़र नहीं आई।
बिहार : इतिहास के मंच पर, वर्तमान की हाशिये पर
जब भी बिहार की चर्चा होती है, तो वही सुनाई देता है: चाणक्य और चंद्रगुप्त की भूमि, बुद्ध और महावीर की धरती, आर्यभट्ट और गुरु गोविंद सिंह की जन्मभूमि।
पर क्या केवल यह कह देना ही काफ़ी है?
आज का सच यह है कि बिहार पलायन की पीड़ा, सस्ते मज़दूर की पहचान और राजनीतिक उपेक्षा का पर्याय बन गया है। मंचों से गूँजने वाला स्वर्णिम इतिहास, ज़मीनी हक़ीक़त के सामने बौना साबित होता है।
सच यह भी है कि बिहारी बाहर जाकर खूब नाम कमाते हैं… नौकरशाह, उद्योगपति, कलाकार, मजदूर, वैज्ञानिक हर क्षेत्र में वे राष्ट्र निर्माण का हिस्सा हैं। लेकिन अपने घर की सुध लेने के लिए शायद ही कोई आगे आता है। मेरी माँ बोलती है : “जिस पत्नी का मज़ाक उसका पति घरवालों के सामने करता है, उसका मज़ाक फिर सब उड़ाते हैं।”
बिहार भी उसी पत्नी की तरह है। जब हम ही अपने प्रदेश को तिरस्कार की नज़र से देखते हैं, तो बाहर वाले क्यों सम्मान देंगे?
बाढ़ जाति नहीं देखती। उसका पानी सबके आँगन में बराबर उतरता है।
फिर क्यों हम जातीय दीवारों में बँटकर वोट डालते हैं?
नेताओं को पता है कि जाति के नाम पर समर्थन मिलेगा, इसलिए विकास और आपदा-प्रबंधन कभी प्राथमिकता नहीं बनता।
अगर हम इस बाढ़ से भी सबक न लें, तो कब लेंगे?
बिहार वह भूमि है जिसने दुनिया को शासन की नीति, धर्म का मार्ग और ज्ञान की ज्योति दी। यही धरती आज अपने ही लोग और नेताओं से उम्मीद कर रही है कि कोई उसकी पीड़ा को समझे।
लेकिन पहला कदम हमें ही उठाना होगा।
सरकार को दोष देना आसान है, पर मातृभूमि के लिए योगदान देना कठिन। और यही कठिन कार्य हमें करना होगा।
बाढ़ ने एक बार फिर दिखाया कि आपदा जात-पात, और वर्ग की दीवारें गिरा देती है। सवाल यह है कि क्या बिहारी समाज भी इन दीवारों को गिराकर एकजुट होगा?
अगर हाँ,तो आने वाला कल वही स्वर्णिम बिहार होगा, जिसके लिए इतिहास आज भी गर्व से गवाही देता है।
बिहार की पीड़ा को अनसुना मत कीजिए, यह केवल प्रदेश नहीं, यह भारत की आत्मा है।